कभी सोचा है कि जिन सरकारी अस्पतालों को लेकर लोग अक्सर शिकायत करते नज़र आते हैं, वहीं अस्पताल एक साल में लगभग तीन करोड़ नए मरीज़ों की भीड़ कैसे संभाल गए? उत्तर प्रदेश से आए ताज़ा आंकड़े कुछ ऐसी ही कहानी बता रहे हैं, और यह कहानी सिर्फ नंबरों की नहीं, बल्कि आम आदमी के भरोसे की भी है।
एक साल में कितना बदला आंकड़ा
उत्तर प्रदेश के हॉस्पिटल इनफॉरमेशन सिस्टम यानी HIS से मिले आंकड़ों के मुताबिक़, सरकारी अस्पतालों की OPD में इलाज कराने पहुंचने वाले मरीज़ों की संख्या में 12.7 फ़ीसदी का उछाल आया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की OPD में 23 करोड़ 26 लाख 92 हज़ार 346 मरीज़ पहुंचे थे। अगले ही साल, यानी 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 26 करोड़ 21 लाख 86 हज़ार 275 हो गया। मतलब सिर्फ एक साल में क़रीब 2 करोड़ 95 लाख और लोग सरकारी अस्पताल की OPD में इलाज कराने पहुंचे।
भर्ती मरीज़ों यानी IPD की तस्वीर तो और भी दिलचस्प है। 2024-25 में 1 करोड़ 3 लाख 6 हज़ार 336 मरीज़ सरकारी अस्पतालों में भर्ती हुए थे। 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 1 करोड़ 23 लाख 35 हज़ार 444 पहुंच गई। यानी क़रीब 20 लाख 29 हज़ार ज़्यादा मरीज़ भर्ती हुए, और यह बढ़ोतरी 19.7 फ़ीसदी की रही। उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने ख़ुद यह आंकड़े साझा करते हुए कहा कि आम लोगों को अच्छा इलाज देना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
इतने अधिक मरीज आए क्यों?
अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी तादाद में लोग सरकारी अस्पतालों का रुख़ क्यों कर रहे हैं। ब्रजेश पाठक के मुताबिक़, इसकी एक बड़ी वजह अस्पतालों में हो रहा बदलाव है। सरकारी अस्पतालों में नए और आधुनिक मेडिकल उपकरण लगाए गए हैं। डायलिसिस, पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसी जांचों की क्षमता भी बढ़ाई गई है — यानी जो जांच पहले सिर्फ़ बड़े शहरों के प्राइवेट अस्पतालों में हो पाती थी, अब वह सरकारी अस्पताल में भी मिल रही है। इसके अलावा मरीज़ों को समय पर अस्पताल तक लाने के लिए एम्बुलेंस सेवाओं को भी बेहतर किया गया है। और तो और, केंद्र और राज्य सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं का फ़ायदा ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश भी लगातार जारी है।
सिर्फ भरोसा या कुछ और वजहें भी
यहां एक बात ईमानदारी से समझनी ज़रूरी है — मरीज़ों की संख्या बढ़ना सिर्फ़ “लोगों का भरोसा बढ़ने” की कहानी नहीं होती। कुछ और वजहें भी इसमें शामिल हो सकती हैं, जैसे प्रदेश की बढ़ती आबादी, बेहतर रिकॉर्ड-कीपिंग यानी अस्पतालों का अब पहले से ज़्यादा सही ढंग से डेटा दर्ज करना, या फिर मौसमी बीमारियों का असर। आंकड़ों में इन बातों का ज़िक्र नहीं है, इसलिए यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि पूरी बढ़ोतरी सिर्फ़ भरोसे की वजह से हुई है। हां, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अगर अस्पतालों में सुविधाएं सच में बेहतर नहीं होतीं, तो मरीज़ इतनी बड़ी संख्या में लौट-लौटकर वहां नहीं आते।
आम मरीज के लिए इसका मतलब क्या है
अगर आप या आपके घर का कोई सदस्य सरकारी अस्पताल में इलाज कराने की सोच रहा है, तो इन आंकड़ों से एक अच्छी बात यह पता चलती है — डायलिसिस, पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसी सुविधाएं अब पहले से ज़्यादा जगह और ज़्यादा क्षमता के साथ उपलब्ध हैं। बढ़ी हुई भीड़ का मतलब यह भी हो सकता है कि कुछ जगहों पर वेटिंग टाइम ज़्यादा लग सकता है, इसलिए संभव हो तो अपॉइंटमेंट पहले से ले लेना या सुबह जल्दी पहुंचना बेहतर रहेगा। बीमा और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के पात्र मरीज़ों को इसका सीधा फ़ायदा मिल सकता है, क्योंकि सरकार का साफ़ कहना है कि इन योजनाओं का लाभ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने पर काम चल रहा है।
आंकड़े अच्छे हैं, पर असली परीक्षा आगे है
लगभग तीन करोड़ ज़्यादा OPD मरीज़ और बीस लाख से ज़्यादा नए भर्ती मरीज़ — यह आंकड़े दिखाते हैं कि उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की तरफ़ लोगों का रुख़ बढ़ा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए डॉक्टर, नर्स, बेड और दवाइयां भी उसी रफ़्तार से बढ़ रही हैं या नहीं। अगर सुविधाएं और स्टाफ़ भी साथ-साथ बढ़ते रहे, तो यह बढ़ोतरी सच में एक अच्छी ख़बर साबित होगी। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या इलाज की गुणवत्ता और मरीज़ों का अनुभव भी इसी तरह बेहतर होता है, या सिर्फ़ संख्या ही बढ़ती रहती है।
चिकित्सा अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और यह चिकित्सीय सलाह की जगह नहीं ले सकता। अपनी सेहत से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए हमेशा किसी योग्य डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।



