लखनऊ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) चिकित्सालय में न्यूरोसर्जरी सेवा शुरू होने के बाद एक गंभीर और जटिल स्पाइन सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। 37 वर्षीय मरीज की रीढ़ की हड्डी में टीबी संक्रमण के कारण न्यूरल संरचनाओं पर दबाव पड़ रहा था। उसके पैर की मांसपेशियों की ताकत लगातार कम हो रही थी।
चिकित्सकों के अनुसार, समय पर सर्जरी नहीं होने पर मरीज में गंभीर न्यूरोलॉजिकल कमजोरी और पैरालिसिस का जोखिम बढ़ सकता था।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जटिल न्यूरोसर्जरी अक्सर महंगी होती है और हर मरीज के लिए निजी अस्पताल में इसका खर्च उठाना आसान नहीं होता। अस्पताल के अनुसार, इस मामले में जिस तरह की सर्जरी निजी क्षेत्र में कराई जाती है, उसका खर्च करीब तीन लाख रुपये तक हो सकता है।
डेढ़ साल से कमर दर्द से परेशान था मरीज
जनपद सिद्धार्थनगर के मधुकरपुर गांव निवासी 37 वर्षीय विनय तिवारी पिछले करीब डेढ़ वर्ष से कमर के गंभीर दर्द से परेशान थे। मरीज को टीबी की बीमारी भी थी।
लगातार समस्या बनी रहने के बाद उन्होंने लखनऊ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) चिकित्सालय में न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी से परामर्श लिया।
जांच के दौरान स्थिति सामान्य कमर दर्द से कहीं अधिक गंभीर निकली।
MRI जांच में रीढ़ की हड्डी के L3 vertebra में टीबी संक्रमण पाया गया। इसके कारण स्पाइनल कॉर्ड और उससे जुड़ी न्यूरल संरचनाओं पर दबाव पड़ रहा था। मरीज के बाएं पैर की जांघ और घुटने के नीचे की मांसपेशियों की ताकत भी कम हो रही थी।
यही वह स्थिति थी जहां केवल दर्द का इलाज पर्याप्त नहीं था। दबाव कम करने और रीढ़ को स्थिर रखने के लिए सर्जिकल हस्तक्षेप की जरूरत थी।
रीढ़ की टीबी क्यों बन सकती है गंभीर समस्या?
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल, हजरतगंज लखनऊ के निदेशक डॉ जी पी गुप्ता ने बताया कि रीढ़ की हड्डी में होने वाला टीबी संक्रमण केवल दर्द तक सीमित नहीं रह सकता। कुछ मामलों में संक्रमण कशेरुकाओं को प्रभावित कर सकता है और आसपास की संरचनाओं पर दबाव पैदा कर सकता है।
यदि दबाव नसों या स्पाइनल कॉर्ड तक पहुंचता है, तो मरीज को कमजोरी, चलने में परेशानी, संवेदना में बदलाव और गंभीर मामलों में पैरालिसिस जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
हालांकि हर मरीज में बीमारी का असर एक जैसा नहीं होता। इसलिए केवल कमर दर्द के आधार पर रीढ़ की टीबी या न्यूरोलॉजिकल समस्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
इस मामले में MRI ने चिकित्सकों को रीढ़ की स्थिति और न्यूरल संरचनाओं पर पड़ रहे दबाव को समझने में मदद की।
ऑपरेशन में लगाए गए टाइटेनियम स्क्रू और रॉड
मरीज की स्थिति को देखते हुए न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी के नेतृत्व में सर्जरी की गई।
ऑपरेशन के दौरान L2 से L4 तक spinal fixation किया गया। इसके लिए टाइटेनियम स्क्रू और रॉड का इस्तेमाल किया गया।
शल्यक्रिया करीब दो घंटे चली।
स्पाइन सर्जरी में केवल प्रभावित हिस्से तक पहुंचना ही चुनौती नहीं होता। रीढ़ की हड्डी और आसपास की नसों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। न्यूरल संरचनाओं को नुकसान पहुंचने पर कमजोरी स्थायी हो सकती है।
इसी कारण ऐसी सर्जरी में न्यूरोसर्जरी के साथ-साथ अनुभवी एनेस्थीसिया और नर्सिंग टीम की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
ऑपरेशन के बाद पैरों की ताकत में सुधार
सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति संतोषजनक बताई गई है।
चिकित्सकों के अनुसार, ऑपरेशन के बाद मरीज के पैरों में ताकत आनी शुरू हो गई है और वह दोनों पैरों को चला पा रहा है। फिलहाल उसका उपचार सिविल अस्पताल के न्यूरोसर्जरी वार्ड में जारी है।
यह शुरुआती सुधार निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। हालांकि किसी भी न्यूरोसर्जरी के बाद लंबे समय के परिणाम का आकलन फॉलो-अप और मरीज की आगे की रिकवरी के आधार पर ही किया जा सकता है।
मरीज की पत्नी सोनी तिवारी ने समय पर उपचार और सफल सर्जरी के लिए चिकित्सकों तथा पूरी टीम के प्रति आभार जताया।
सिविल अस्पताल में शुरू हुई जटिल न्यूरोसर्जरी
सिविल अस्पताल प्रशासन के अनुसार, न्यूरोसर्जन की तैनाती के बाद अस्पताल में इस तरह की गंभीर न्यूरोसर्जरी पहली बार सफलतापूर्वक की गई है।
अस्पताल के निदेशक एवं प्रमुख अधीक्षक डॉ. जी.पी. गुप्ता ने शल्य टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पताल में जटिल न्यूरोसर्जरी की सुविधा उपलब्ध होना गंभीर मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है।
लखनऊ जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) अस्पताल को हजरतगंज स्थित सिविल अस्पताल के रूप में सूचीबद्ध करती है। (Lucknow District)
अस्पताल का पता 4-ए, पार्क रोड, हजरतगंज, लखनऊ बताया गया है। राष्ट्रीय स्तर की अस्पताल संबंधी जानकारी में भी इसे राज्य सरकार के अधीन सिविल अस्पताल के रूप में दर्ज किया गया है। (ACCR)
करीब तीन लाख रुपये के निजी उपचार का दावा
डॉ. विनोद कुमार तिवारी के अनुसार, इसी तरह की जटिल सर्जरी निजी क्षेत्र में कराने पर लगभग तीन लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है।
यह राशि सभी अस्पतालों या सभी मरीजों के लिए समान नहीं होती। सर्जरी का खर्च अस्पताल, प्रक्रिया की जटिलता, इम्प्लांट, अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि, दवाओं और अन्य उपचार पर निर्भर करता है।
फिर भी, सरकारी अस्पताल में ऐसी जटिल सर्जरी की सुविधा का विस्तार उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो महंगे निजी उपचार का खर्च वहन नहीं कर सकते।
एनेस्थीसिया और नर्सिंग टीम का भी रहा अहम योगदान
इस ऑपरेशन की सफलता केवल सर्जिकल टीम तक सीमित नहीं थी।
अस्पताल के अनुसार, एनेस्थीसिया विभाग के प्रमुख डॉ. सुनील कुमार सिंह के नेतृत्व में डॉ. राजेश और डॉ. कासिम की टीम ने एनेस्थीसिया संबंधी देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिस्टर पूजा और सिस्टर किरण ने भी ऑपरेशन के दौरान सहयोग किया।
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी.सी. पांडे और अधीक्षक डॉ. शिवराज सिंह ने पूरी टीम को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी।
जटिल न्यूरोसर्जरी में सर्जन के कौशल के साथ एनेस्थीसिया, नर्सिंग, इमेजिंग, ऑपरेशन थिएटर और पोस्ट-ऑपरेटिव देखभाल की पूरी व्यवस्था मिलकर मरीज के परिणाम को प्रभावित करती है।
रीढ़ की टीबी में किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
रीढ़ की टीबी हमेशा स्पष्ट लक्षणों के साथ सामने नहीं आती। लंबे समय तक रहने वाला कमर या पीठ दर्द कई कारणों से हो सकता है।
लेकिन कुछ स्थितियों में चिकित्सकीय जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।
खासकर यदि कमर दर्द लगातार बना रहे, उपचार के बावजूद सुधार न हो, शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी महसूस हो, चलने में परेशानी बढ़े या पैरों में संवेदना कम होने लगे, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
यदि मरीज को पहले से टीबी है और उसके साथ लगातार पीठ या कमर दर्द तथा न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई दे रहे हैं, तो चिकित्सक को इसकी जानकारी अवश्य देनी चाहिए।
यह भी समझना जरूरी है कि ऐसे लक्षणों का मतलब अनिवार्य रूप से रीढ़ की टीबी नहीं है। कई अन्य बीमारियां भी इसी तरह के लक्षण पैदा कर सकती हैं।
MRI जैसी जांच कब महत्वपूर्ण हो सकती है?
रीढ़ की गंभीर समस्या का पता लगाने में चिकित्सक मरीज के लक्षण, शारीरिक जांच और जरूरत के अनुसार इमेजिंग जांचों का सहारा लेते हैं।
इस मामले में MRI के माध्यम से L3 vertebra में टीबी संक्रमण और न्यूरल संरचनाओं पर दबाव की जानकारी मिली।
MRI से रीढ़, डिस्क, स्पाइनल कॉर्ड और आसपास के नरम ऊतकों की विस्तृत तस्वीर प्राप्त की जा सकती है। लेकिन कौन-सी जांच आवश्यक है, यह मरीज की स्थिति और चिकित्सक के आकलन पर निर्भर करता है।
हर कमर दर्द वाले मरीज को MRI की जरूरत नहीं होती।
समय पर पहचान क्यों महत्वपूर्ण है?
रीढ़ से जुड़ी समस्याओं में एक महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि बीमारी की पहचान कितनी जल्दी हुई।
यदि किसी मरीज में नसों पर दबाव बढ़ रहा है और उसके कारण मांसपेशियों की ताकत कम हो रही है, तो स्थिति का समय पर मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो सकता है। देरी होने पर न्यूरोलॉजिकल नुकसान बढ़ने की आशंका रहती है।
हालांकि उपचार का फैसला बीमारी के कारण, संक्रमण की स्थिति, न्यूरोलॉजिकल कमजोरी, रीढ़ की स्थिरता और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों को देखकर किया जाता है।
इसलिए लगातार कमर दर्द को केवल उम्र, काम की थकान या सामान्य कमजोरी मानकर लंबे समय तक टालना उचित नहीं है, खासकर जब उसके साथ पैर में कमजोरी या चलने में बदलाव जैसे लक्षण भी हों।
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?
सरकारी अस्पतालों में जटिल उपचार सुविधाओं का विस्तार स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
न्यूरोसर्जरी केवल मस्तिष्क की सर्जरी तक सीमित नहीं है। रीढ़, स्पाइनल कॉर्ड और नसों से जुड़ी कई जटिल स्थितियों में भी न्यूरोसर्जिकल हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है।
लखनऊ जैसे बड़े शहर में सरकारी अस्पताल में ऐसी सेवा उपलब्ध होने से आसपास के जिलों से आने वाले मरीजों को भी लाभ मिल सकता है।
इस मामले में सिद्धार्थनगर से आए मरीज का इलाज राजधानी के सरकारी अस्पताल में होना इस बात का उदाहरण है कि विशेषज्ञ सेवाओं का विस्तार मरीजों को अपने क्षेत्र से बाहर महंगे निजी उपचार की तलाश में जाने की जरूरत को कुछ हद तक कम कर सकता है।
हालांकि किसी एक सफल ऑपरेशन के आधार पर पूरे स्वास्थ्य तंत्र की क्षमता का आकलन नहीं किया जा सकता। सेवा की निरंतरता, पर्याप्त विशेषज्ञ, उपकरण, ICU सुविधा, फॉलो-अप और मरीजों की संख्या जैसे कई दूसरे पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
इस मामले से आम लोगों को क्या सीख मिलती है?
इस केस की सबसे बड़ी सीख यह है कि लंबे समय तक बने रहने वाले कमर दर्द को हमेशा सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर दर्द लगातार बढ़ रहा है या उसके साथ पैरों में कमजोरी, सुन्नपन, चलने में परेशानी अथवा अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
टीबी से पीड़ित मरीजों में भी नए या लगातार बने रहने वाले पीठ और कमर के लक्षणों की जानकारी अपने डॉक्टर को देना महत्वपूर्ण है।
समय पर जांच से बीमारी का कारण समझने में मदद मिल सकती है और जरूरत पड़ने पर उपचार की दिशा जल्दी तय की जा सकती है।
विनय तिवारी के मामले में भी लंबे समय से चल रही समस्या की जांच के बाद रीढ़ में टीबी संक्रमण और न्यूरल संरचनाओं पर दबाव की स्थिति सामने आई। इसके बाद सर्जरी की गई और अस्पताल के अनुसार, शुरुआती रिकवरी में पैरों की ताकत में सुधार दिखाई दिया है।
यह सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में जटिल न्यूरोसर्जिकल सेवाओं के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत मानी जा सकती है।
Medical Disclaimer
यह लेख उपलब्ध प्रेस रिलीज और अस्पताल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें किसी मरीज की व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प प्रस्तुत करने का उद्देश्य नहीं है। रीढ़ की टीबी, स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव, न्यूरोलॉजिकल कमजोरी या किसी भी गंभीर लक्षण की स्थिति में योग्य चिकित्सक से प्रत्यक्ष परामर्श लेना चाहिए। किसी भी जांच या सर्जरी का निर्णय मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर विशेषज्ञ चिकित्सक ही लेते हैं।



