कभी सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलती है। कभी थोड़ी दूर चलने के बाद थकान महसूस होती है। कई लोग इसे उम्र बढ़ने, कमजोरी या सामान्य फिटनेस की कमी मान लेते हैं। लेकिन हर बार ऐसा होना सामान्य नहीं है।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन यानी फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में बढ़ा हुआ रक्तचाप भी सांस फूलने का कारण हो सकता है। यह स्थिति धीरे-धीरे विकसित हो सकती है और शुरुआती लक्षण दूसरी हृदय या फेफड़ों की बीमारियों जैसे दिखाई दे सकते हैं। इसी वजह से इसका पता लगाने में देरी हो सकती है।
लखनऊ में आयोजित दो दिवसीय PH Summit 2026 के पहले दिन विशेषज्ञों ने इसी चुनौती पर विस्तार से चर्चा की। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञ शामिल हुए।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य बीमारी की पहचान, आधुनिक उपचार और मरीजों के बेहतर परिणामों के बीच की दूरी कम करना था।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन आखिर है क्या?
साधारण भाषा में समझें तो फेफड़ों तक खून पहुंचाने वाली रक्त वाहिकाओं में दबाव सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे हृदय के दाहिने हिस्से को फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।
समय के साथ यह अतिरिक्त दबाव हृदय के दाहिने हिस्से पर असर डाल सकता है। पल्मोनरी हाइपरटेंशन अपने आप भी हो सकता है और हृदय, फेफड़ों या दूसरी बीमारियों से जुड़ा भी हो सकता है।
यही वजह है कि इसे केवल ‘फेफड़ों का ब्लड प्रेशर’ कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे का कारण पता लगाना इलाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सांस फूलना शुरुआती संकेत हो सकता है
पल्मोनरी हाइपरटेंशन के शुरुआती लक्षण कई बार इतने सामान्य होते हैं कि मरीज उन्हें गंभीरता से नहीं लेता।
सबसे आम शिकायतों में सांस फूलना और थकान शामिल हैं। शुरुआत में सांस फूलना केवल व्यायाम या ज्यादा मेहनत के दौरान हो सकता है। बीमारी बढ़ने पर सामान्य गतिविधियों के दौरान भी परेशानी हो सकती है।
इसके अलावा ये लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं—
- सीने में दर्द या दबाव
- चक्कर आना
- बेहोशी की स्थिति
- लगातार थकान और कमजोरी
- पैरों, टखनों या पेट में सूजन
- तेज धड़कन
- सूखी खांसी
- कुछ मामलों में खांसी के साथ खून आना
- होंठ या त्वचा का नीला पड़ना
इनमें से कोई एक लक्षण होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को पल्मोनरी हाइपरटेंशन ही है। यही लक्षण कई दूसरी बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए लक्षणों के आधार पर खुद बीमारी तय करने के बजाय चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

बीमारी के पांच प्रमुख समूह
PH Summit 2026 में पल्मोनरी हाइपरटेंशन को अलग-अलग कारणों के आधार पर समझने पर जोर दिया गया।
इसे सामान्य तौर पर पांच समूहों में बांटा जाता है।
ग्रुप 1: पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन यानी PAH।
ग्रुप 2: बाईं ओर के हृदय रोग के कारण होने वाला पल्मोनरी हाइपरटेंशन।
ग्रुप 3: फेफड़ों की बीमारी या शरीर में ऑक्सीजन की कमी से जुड़ा पल्मोनरी हाइपरटेंशन।
ग्रुप 4: फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में रुकावट से संबंधित स्थिति, जिसमें क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन यानी CTEPH प्रमुख है।
ग्रुप 5: ऐसे मामले जिनमें कारण स्पष्ट नहीं होता या कई कारण एक साथ भूमिका निभाते हैं।
राष्ट्रीय हृदय, फेफड़ा और रक्त संस्थान (NHLBI) भी पल्मोनरी हाइपरटेंशन को इन्हीं पांच व्यापक समूहों में वर्गीकृत करता है।
इस वर्गीकरण का महत्व इसलिए है क्योंकि हर मरीज का इलाज एक जैसा नहीं होता।
किन लोगों में जोखिम ज्यादा हो सकता है?
पल्मोनरी हाइपरटेंशन कई कारणों से हो सकता है। बाईं ओर के हृदय रोग, फेफड़ों की पुरानी बीमारियां और कुछ अन्य चिकित्सीय स्थितियां इससे जुड़ी हो सकती हैं। कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण भी पाए जाते हैं, जबकि कुछ मामलों में बीमारी का स्पष्ट कारण नहीं मिल पाता।
फेफड़ों की पुरानी बीमारी, इंटरस्टिशियल लंग डिजीज, कुछ जन्मजात हृदय रोग, संयोजी ऊतक संबंधी बीमारियां और फेफड़ों में पुराने रक्त के थक्के जैसे कारणों पर चिकित्सक विशेष ध्यान देते हैं।
इसीलिए लंबे समय से फेफड़ों या हृदय की बीमारी से जूझ रहे मरीजों में सांस फूलने में बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन के उन मरीजों में बैलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी कारगर हो सकती है, जिनमें सर्जरी संभव नहीं होती।
– डॉ. भागीरथ रघुरामन

बीमारी की जांच आसान नहीं, पड़ सकती है कई टेस्ट की जरूरत
पल्मोनरी हाइपरटेंशन की एक बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण कई दूसरी बीमारियों से मिलते-जुलते हैं।
डॉक्टर सबसे पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री और लक्षणों को समझते हैं। इसके बाद स्थिति के अनुसार अलग-अलग जांच कराई जा सकती हैं।
इनमें शामिल हैं—
- ब्लड टेस्ट
- ECG
- चेस्ट एक्स-रे
- इकोकार्डियोग्राफी
- लंग फंक्शन टेस्ट
- एक्सरसाइज टेस्ट
- स्लीप स्टडी
- CT स्कैन
- MRI/कार्डियक MRI
- V/Q स्कैन, और
- जरूरत पड़ने पर जेनेटिक टेस्टिंग
कुछ मरीजों में राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन की भी आवश्यकता पड़ सकती है। यह जांच फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं और हृदय के दाहिने हिस्से में दबाव को सीधे मापने में मदद करती है और पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पुष्टि के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यानी केवल एक टेस्ट के आधार पर हर मरीज का निदान नहीं किया जाता।
यह भी पढ़ें : पल्मोनरी हाइपरटेंशन: सांस फूलना हो सकता है इस गंभीर बीमारी का संकेत, जानिए लक्षण, जांच और इलाज
PH Summit में CTEPH पर भी खास चर्चा
सम्मेलन में क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटेंशन यानी CTEPH पर विशेष ध्यान दिया गया।
यह पल्मोनरी हाइपरटेंशन का ऐसा रूप है जिसमें फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में पुराने रक्त के थक्कों से संबंधित रुकावट बनी रह सकती है। विशेषज्ञों ने बताया कि ऐसे मरीजों में समय पर पहचान महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ मरीजों में सर्जरी सहित विशेष उपचार विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
जिन मरीजों में सर्जरी संभव नहीं होती, उनके लिए बैलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी जैसे उपचार विकल्पों पर भी सम्मेलन में चर्चा हुई।
यही वह क्षेत्र है जहां सही बीमारी की पहचान मरीज के उपचार की दिशा बदल सकती है।
इलाज मरीज की स्थिति और बीमारी के कारण पर निर्भर
पल्मोनरी हाइपरटेंशन का इलाज एक जैसा नहीं होता। सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी होता है कि बीमारी किस समूह में आती है और उसके पीछे क्या कारण है।
इलाज में जरूरत के अनुसार जीवनशैली में बदलाव, ऑक्सीजन थेरेपी और अलग-अलग दवाएं शामिल हो सकती हैं। कुछ मरीजों में विशेष लक्षित दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
PAH में इस्तेमाल होने वाली दवाओं में अलग-अलग वर्ग की दवाएं शामिल हो सकती हैं, जैसे एंडोथेलिन रिसेप्टर एंटागोनिस्ट, PDE-5 इनहिबिटर, प्रोस्टासाइक्लिन आधारित उपचार और सॉल्युबल गुआनिलेट साइक्लेज स्टिमुलेटर।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
किसी दूसरे मरीज की दवा देखकर अपनी दवा शुरू करना सुरक्षित नहीं है। पल्मोनरी हाइपरटेंशन के अलग-अलग प्रकारों में उपचार अलग हो सकता है। उपचार विशेषज्ञ की सलाह और जांच के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
जब बीमारी गंभीर हो जाती है
PH Summit में गंभीर पल्मोनरी हाइपरटेंशन और राइट-वेंट्रिकुलर फेलियर जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई।
कुछ गंभीर मरीजों में ICU आधारित उपचार की आवश्यकता पड़ सकती है। विशेष परिस्थितियों में ECMO जैसी उन्नत तकनीक भी सहायक हो सकती है।
अत्यधिक गंभीर और उपचार से नियंत्रित न होने वाले चुनिंदा मामलों में लंग ट्रांसप्लांट या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट पर भी विचार किया जा सकता है। हालांकि यह हर मरीज के लिए अंतिम या अनिवार्य उपचार नहीं है। इसका निर्णय बीमारी के प्रकार, गंभीरता, अन्य स्वास्थ्य स्थितियों और विशेषज्ञ मूल्यांकन के आधार पर होता है।
विशेषज्ञों ने इलाज में ‘सही मरीज, सही समय’ पर दिया जोर
PH Summit 2026 में अमेरिका, आयरलैंड और भारत के कई विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और वैज्ञानिक विषय साझा किए।
डॉ. बाशा जे. खान ने इस बात पर जोर दिया कि पल्मोनरी हाइपरटेंशन कोई एक बीमारी नहीं है। इसके अलग-अलग प्रकार और कारणों को समझना सही उपचार चुनने की पहली सीढ़ी है।
डॉ. संदीप सहाय ने इलाज में सही मरीज को सही समय पर सही उपचार देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. प्रशांत बोभाटेने बीमारी की पुष्टि और उसकी गंभीरता समझने में राइट-हार्ट कैथीटेराइजेशन की भूमिका पर चर्चा की।
वहीं डॉ. मानसी गुप्ताने इंटरस्टिशियल लंग डिजीज वाले मरीजों में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की जल्द पहचान को महत्वपूर्ण बताया।
डॉ. दिगंबर बेहराने रिस्क असेसमेंट की भूमिका पर चर्चा की। उनके अनुसार इससे यह तय करने में मदद मिलती है कि किस मरीज को कितनी जल्दी और कितने स्तर के उपचार की आवश्यकता है।
CTEPH पर भी विशेषज्ञों ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने रखा। डॉ. सैयद रेहान कादरीने समय पर पहचान के महत्व पर बात की, जबकि डॉ. भागीरथ रघुरामनने ऐसे मरीजों में बैलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी की भूमिका पर चर्चा की, जिनमें सर्जरी संभव नहीं होती।
AI और आधुनिक तकनीक से बढ़ रही हैं नई संभावनाएं
सम्मेलन में केवल दवाओं और पारंपरिक जांचों पर ही चर्चा नहीं हुई। आधुनिक तकनीक की भूमिका भी सामने आई।
पल्मोनरी वैस्कुलर बीमारी की जांच में CT, V/Q स्कैनिंग और MRI जैसे अलग-अलग इमेजिंग माध्यमों की भूमिका पर चर्चा हुई।
डॉ. राहुल चंदोलाने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लंग ट्रांसप्लांटेशन में हो रही प्रगति को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया।
हालांकि किसी भी नई तकनीक को मरीज के लिए उपयोगी बनाने से पहले उसके वैज्ञानिक प्रमाण और चिकित्सकीय उपयोगिता को समझना जरूरी है। तकनीक अपने आप इलाज नहीं है। उसका लाभ तभी है जब वह सही निदान और उपचार के निर्णय को बेहतर बनाए।
KGMU में बहु-विषयक इलाज पर जोर
सम्मेलन में बताया गया कि KGMU का पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग पल्मोनरी हाइपरटेंशन से जुड़े मरीजों की जांच और उपचार में विभिन्न विशेषज्ञताओं के साथ सहयोग करता है।
जरूरत के अनुसार पल्मोनरी मेडिसिन, कार्डियोलॉजी, रुमेटोलॉजी, रेडियोडायग्नोसिस और अन्य विशेषज्ञताओं के बीच समन्वय किया जाता है।
यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है क्योंकि पल्मोनरी हाइपरटेंशन केवल फेफड़ों तक सीमित समस्या नहीं हो सकती। कई मरीजों में हृदय, फेफड़ों या दूसरी बीमारियां इसके पीछे हो सकती हैं।
सबसे जरूरी बात: सांस फूलने को नजरअंदाज न करें
पल्मोनरी हाइपरटेंशन की शुरुआती पहचान मुश्किल हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर सांस फूलने को नजरअंदाज कर दिया जाए।
अगर बिना स्पष्ट कारण लगातार सांस फूल रही है, सामान्य गतिविधियों में पहले की तुलना में अधिक थकान हो रही है, बार-बार चक्कर आते हैं, सीने में दर्द होता है या पैरों में सूजन दिखाई देती है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है। ये लक्षण कई दूसरी बीमारियों में भी हो सकते हैं, इसलिए जांच के बिना निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
विशेष रूप से उन लोगों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए जिन्हें पहले से हृदय या फेफड़ों की बीमारी है।

KGMU लखनऊ में हुआ PH Summit 2026
KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से शताब्दी अस्पताल फेज-2 के ऑडिटोरियम में आयोजित PH Summit 2026 में AIIMS ऋषिकेश के पूर्व निदेशक और KGMU के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. रवि कांत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। वैज्ञानिक चर्चा में देश और विदेश के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
सम्मेलन की थीम “Advancing Diagnosis, Therapeutics and Outcomes” रही। इसमें पल्मोनरी हाइपरटेंशन के निदान से लेकर आधुनिक दवाओं, CTEPH, इमेजिंग, ICU प्रबंधन, राइट-हार्ट फेलियर और ECMO जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
आयोजन सचिव प्रो. वेद प्रकाश के अनुसार, सम्मेलन का उद्देश्य नए वैज्ञानिक अध्ययनों और मरीजों के उपचार के बीच की दूरी कम करना है, ताकि उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी को बेहतर चिकित्सकीय देखभाल में बदला जा सके।
एक नजर में : कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
यदि आपको इनमें से कोई समस्या लगातार या बढ़ती हुई महसूस हो रही है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है—
• बिना स्पष्ट कारण सांस फूलना
• पहले की तुलना में जल्दी थक जाना
• चक्कर या बेहोशी
• सीने में दर्द या दबाव
• पैरों, टखनों या पेट में सूजन
• लगातार कमजोरी
• धड़कन तेज महसूस होना
• खांसी, खासकर खून आने के साथ
इन लक्षणों का मतलब पल्मोनरी हाइपरटेंशन होना जरूरी नहीं है। लेकिन इन्हें लगातार नजरअंदाज करना भी सही नहीं है।
एक जरूरी स्पष्टीकरण
किसी मरीज का पूर्वानुमान बीमारी के प्रकार, कारण, गंभीरता, उपचार की प्रतिक्रिया, अन्य बीमारियों और कई दूसरे कारकों पर निर्भर करता है। इसी तरह लंग ट्रांसप्लांट या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट हर मरीज के लिए अनिवार्य या एकमात्र अंतिम उपचार नहीं होता। उपलब्ध चिकित्सा विकल्पों का निर्णय विशेषज्ञ चिकित्सक मरीज की व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर करते हैं।
निष्कर्ष
पल्मोनरी हाइपरटेंशन ऐसी स्थिति है जिसे शुरुआती दौर में पहचानना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसके लक्षण सामान्य लग सकते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक है।
लेकिन लगातार सांस फूलना, थकान, चक्कर या सीने में दर्द को केवल उम्र या कमजोरी का असर मानकर छोड़ देना उचित नहीं है।
PH Summit 2026 में विशेषज्ञों की चर्चा का मूल संदेश भी यही रहा कि सही बीमारी की पहचान, सही समय पर जांच और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार बेहतर परिणामों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
इस बीमारी में सबसे महत्वपूर्ण बात डरना नहीं, बल्कि लक्षणों को समझना और जरूरत पड़ने पर समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना है।
डिस्क्लेमर
यह पोस्ट मुख्य रूप से PH Summit 2026 की कवरेज और सामान्य चिकित्सा जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाना है, किसी व्यक्ति की बीमारी का निदान करना या व्यक्तिगत उपचार बताना नहीं। पल्मोनरी हाइपरटेंशन के लक्षण कई अन्य हृदय और फेफड़ों की बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। किसी भी लक्षण, जांच या उपचार को लेकर योग्य चिकित्सक की सलाह लें। दवाएं अपने आप शुरू या बंद न करें। गंभीर सांस फूलने, सीने में दर्द, बेहोशी या अचानक बिगड़ती स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता लें।



