फेफड़ों की धमनियों में बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर (PH) बन सकता है जानलेवा। देर से पहचान होने पर 3 साल में जान का खतरा 45% तक, विशेषज्ञों ने दिए टिप्स…
सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना… थोड़ी दूर चलने पर थकान… कभी-कभी चक्कर या सीने में भारीपन… इन लक्षणों को अक्सर उम्र, कमजोरी या फेफड़ों की सामान्य समस्या से जोड़ दिया जाता है। लेकिन कुछ मामलों में इनके पीछे पल्मोनरी हाइपरटेंशन (PH) जैसी गंभीर स्थिति भी हो सकती है।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन में फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में रक्तचाप सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे हृदय के दाहिने हिस्से को फेफड़ों तक रक्त पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। समय के साथ यह हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
इसी बीमारी की जल्द पहचान, सही जांच और बेहतर इलाज पर चर्चा के लिए लखनऊ में दिवसीय PH Summit 2026 का आयोजन किया गया। सम्मेलन के दूसरे दिन विशेष हैंड्स-ऑन वर्कशॉप आयोजित की गईं।
इनका उद्देश्य केवल डॉक्टरों को बीमारी के बारे में बताना नहीं था। उन्हें जांच की तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना भी इसका अहम हिस्सा रहा।
दूसरे दिन तीन विशेष हैंड्स-ऑन वर्कशॉप
KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से आयोजित इन कार्यशालाओं में डॉक्टरों और डेलीगेट्स ने विशेषज्ञों की निगरानी में विभिन्न जांच तकनीकों को समझा।
तीन प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया—
- इकोकार्डियोग्राफी
- राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन
- कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग यानी CPET
विशेषज्ञों के अनुसार, पल्मोनरी हाइपरटेंशन जैसी बीमारी में केवल लक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होता। बीमारी की पुष्टि और उसकी गंभीरता समझने के लिए कई स्तरों पर जांच की जरूरत पड़ सकती है।
इकोकार्डियोग्राफी से समझा गया राइट हार्ट का काम
पहली वर्कशॉप का नेतृत्व डॉ. अमित आनंद और उनकी टीम ने किया। इसमें करीब 30 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
इस कार्यशाला में पल्मोनरी हाइपरटेंशन के मरीजों में इकोकार्डियोग्राफी के इस्तेमाल पर प्रशिक्षण दिया गया। खासतौर पर राइट हार्ट के कामकाज का आकलन कैसे किया जाए, इस पर व्यावहारिक जानकारी दी गई।
इकोकार्डियोग्राफी एक ऐसी जांच है जिसमें अल्ट्रासाउंड की मदद से हृदय की संरचना और उसके काम करने के तरीके को देखा जाता है। यह पल्मोनरी हाइपरटेंशन की आशंका का आकलन करने में मदद कर सकती है। हालांकि, अंतिम निदान के लिए कई बार दूसरी जांचों की जरूरत होती है।
यही वजह है कि इस वर्कशॉप में केवल मशीन चलाने पर जोर नहीं रहा। इमेज की सही व्याख्या और राइट हार्ट की स्थिति को समझने पर भी ध्यान दिया गया।
राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन की बारीकियां समझीं
दूसरी वर्कशॉप प्रो. डॉ. वेद प्रकाश और उनकी टीम ने संचालित की। इसमें 28 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
इसमें राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रशिक्षण दिया गया।
यह जांच पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पुष्टि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसमें एक पतली ट्यूब यानी कैथेटर को रक्त वाहिका के रास्ते हृदय के दाहिने हिस्से और पल्मोनरी आर्टरी तक पहुंचाया जाता है। इससे वहां के दबाव और रक्त प्रवाह से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
वर्कशॉप का उद्देश्य प्रतिभागियों को इस प्रक्रिया की तकनीकी समझ देना था। साथ ही यह भी समझाना था कि प्राप्त आंकड़ों को बीमारी की स्थिति से कैसे जोड़ा जाए।
यह जांच सामान्य स्वास्थ्य जांच जैसी प्रक्रिया नहीं है। इसे विशेषज्ञ चिकित्सकीय परिस्थितियों में ही किया जाता है।

CPET से पता चलता है शरीर व्यायाम के दौरान कैसे प्रतिक्रिया करता है
तीसरी वर्कशॉप डॉ. बाशा जे. खान और उनकी टीम के नेतृत्व में हुई। इसमें करीब 34 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
इसका विषय था कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग यानी CPET।
इस जांच में व्यायाम के दौरान शरीर की प्रतिक्रिया का आकलन किया जाता है। इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि मरीज का हृदय, फेफड़े और शरीर ऑक्सीजन का इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन में मरीज की एक्सरसाइज क्षमता और फंक्शनल स्थिति को समझना उपचार की योजना के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस वर्कशॉप में प्रतिभागियों को CPET के माध्यम से मरीज की कार्यक्षमता का आकलन करने की व्यावहारिक जानकारी दी गई।
केवल किताबों से बीमारी की पूरी तस्वीर नहीं मिलती
केवल किताबों से बीमारी की पूरी तस्वीर नहीं मिलती। PH Summit के दूसरे दिन आयोजित वर्कशॉप की सबसे महत्वपूर्ण बात यही रही।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन की पहचान में केवल किसी एक लक्षण या एक जांच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक जांच और प्रारंभिक टेस्ट के बाद इकोकार्डियोग्राफी, फेफड़ों की जांच, CT, MRI, V/Q स्कैन और जरूरत के अनुसार राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन जैसी जांचों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कौन-सी जांच करनी है, यह मरीज की स्थिति और बीमारी के संभावित कारण पर निर्भर करता है।
इसीलिए हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग महत्वपूर्ण है।
वर्कशॉप में डॉक्टरों को विशेषज्ञों की देखरेख में तकनीकों को समझने और उनकी व्याख्या करने का अवसर मिला। इसका उद्देश्य भविष्य में मरीजों की जांच और जोखिम के आकलन को अधिक व्यवस्थित बनाना था।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन आखिर है क्या?

सरल शब्दों में समझें तो यह फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में बढ़े हुए दबाव से जुड़ी स्थिति है।
हृदय का दाहिना हिस्सा फेफड़ों तक रक्त भेजता है। जब फेफड़ों की रक्त वाहिकाएं संकरी, कठोर या किसी कारण से अवरुद्ध हो जाती हैं, तो रक्त को आगे भेजना मुश्किल हो सकता है। इससे हृदय के दाहिने हिस्से पर दबाव बढ़ता है।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन एक ही प्रकार की बीमारी नहीं है। इसके कारणों के आधार पर इसे पांच प्रमुख समूहों में बांटा जाता है—

पल्मोनरी हाइपरटेंशन के पांच प्रकार
- ग्रुप 1: पल्मोनरी आर्टेरियल हाइपरटेंशन यानी PAH
- ग्रुप 2: बाईं ओर की हृदय संबंधी बीमारी से जुड़ा PH
- ग्रुप 3: फेफड़ों की बीमारी या ऑक्सीजन की कमी से जुड़ा PH
- ग्रुप 4: पल्मोनरी आर्टरी में रुकावट, जिसमें CTEPH शामिल है
- ग्रुप 5: कई या अस्पष्ट कारणों से जुड़ा PH
इस वर्गीकरण को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि बीमारी का कारण उपचार के तरीके को प्रभावित करता है।
किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?
पल्मोनरी हाइपरटेंशन के शुरुआती लक्षण हमेशा स्पष्ट नहीं होते। कई बार वे धीरे-धीरे सामने आते हैं।
सबसे आम लक्षणों में सांस फूलना और थकान शामिल हैं। शुरुआत में सांस फूलना केवल शारीरिक मेहनत के दौरान हो सकता है। बीमारी बढ़ने पर यह सामान्य गतिविधियों के दौरान भी महसूस हो सकता है।
इसके अलावा कुछ लोगों में—
- सीने में दर्द या दबाव
- चक्कर आना
- बेहोशी
- कमजोरी
- तेज धड़कन
- पैरों, टखनों या पेट में सूजन
- सूखी खांसी
- कभी-कभी खांसी में खून
जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं।
समस्या यह है कि इन लक्षणों में से कई दूसरी हृदय और फेफड़ों की बीमारियों में भी दिखाई देते हैं। इसलिए केवल लक्षण देखकर पल्मोनरी हाइपरटेंशन का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
समय पर जांच क्यों महत्वपूर्ण है?
PH की पहचान कई बार देर से होती है। इसका एक कारण यह है कि शुरुआती लक्षण सामान्य लग सकते हैं।
मसलन, कोई व्यक्ति पहले की तुलना में थोड़ा कम चल पा रहा है। वह इसे उम्र बढ़ने का असर मान सकता है। कोई व्यक्ति सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलने को सामान्य कमजोरी समझ सकता है।
यही देरी बीमारी की पहचान को मुश्किल बना सकती है।
मेडिकल संस्थानों के अनुसार, PH की जांच में मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक परीक्षण, ECG, चेस्ट एक्स-रे और इकोकार्डियोग्राफी जैसे टेस्ट से शुरुआत हो सकती है। जरूरत के अनुसार CT, MRI, V/Q स्कैन, फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच और राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन किया जा सकता है।
इसलिए लगातार या बिना स्पष्ट कारण होने वाली सांस की समस्या को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।
इलाज हर मरीज के लिए एक जैसा नहीं
पल्मोनरी हाइपरटेंशन का इलाज उसके कारण और प्रकार के आधार पर तय किया जाता है।
कुछ मरीजों में जीवनशैली में बदलाव और ऑक्सीजन जैसी सहायक चिकित्सा की जरूरत हो सकती है। कुछ मरीजों को विशेष दवाएं दी जाती हैं। PAH के कुछ मामलों में रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करने वाली लक्षित दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।
कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रक्रियात्मक या सर्जिकल उपचार भी विकल्प हो सकते हैं।
उदाहरण के लिए, CTEPH के कुछ मरीजों में सर्जिकल उपचार उपयोगी हो सकता है। कुछ ऐसे मरीज भी होते हैं जिनमें बैलून पल्मोनरी एंजियोप्लास्टी जैसे विकल्प पर विचार किया जा सकता है।
बहुत उन्नत और चयनित मामलों में फेफड़े या हार्ट-लंग ट्रांसप्लांटेशन पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन इसे हर पल्मोनरी हाइपरटेंशन मरीज के लिए “अंतिम उपचार” के रूप में नहीं समझना चाहिए। उपचार बीमारी के प्रकार, गंभीरता और मरीज की समग्र स्थिति पर निर्भर करता है।
चिंताजनक आंकड़े : महिलाओं में 2 से 4 गुना अधिक खतरा
विशेषज्ञों ने समिट में पल्मोनरी हाइपरटेंशन से जुड़े कई चौंकाने वाले आंकड़े साझा किए:
निदान में देरी :लक्षण शुरू होने से लेकर बीमारी पकड़ में आने तक औसतन 1.5 से 2 साल का समय बर्बाद हो जाता है।
गंभीर चरण में पहचान :लगभग 70-80% मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है जब वे WHO की गंभीर श्रेणी (क्लास 3 या 4) में पहुंच चुके होते हैं।
महिलाओं को अधिक जोखिम : यह बीमारी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में 2 से 4 गुना अधिक देखी जाती है।
डायलिसिस मरीजों में प्रसार : गुर्दा रोग (Kidney Disease) से पीड़ित और डायलिसिस पर निर्भर मरीजों में इसका असर 41% तक पाया गया है।
PH Summit 2026 का बड़ा संदेश
दो दिन चले इस सम्मेलन और विशेष रूप से दूसरे दिन की हैंड्स-ऑन वर्कशॉप से एक बात स्पष्ट होती है।
पल्मोनरी हाइपरटेंशन की चुनौती केवल बीमारी को पहचानने की नहीं है। सही समय पर सही जांच और उसके परिणामों की सही व्याख्या भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इकोकार्डियोग्राफी से लेकर राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन और CPET तक, अलग-अलग जांचें बीमारी की अलग-अलग तस्वीर सामने ला सकती हैं।
यही वजह है कि विशेषज्ञों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया।
KGMU के पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की ओर से आयोजित PH Summit 2026 में बीमारी के निदान, जोखिम आकलन और उपचार को बेहतर बनाने पर चर्चा हुई। दूसरे दिन की कार्यशालाओं ने इस चर्चा को सैद्धांतिक दायरे से निकालकर व्यावहारिक प्रशिक्षण से जोड़ा।
आखिरकार इसका सबसे बड़ा लाभ मरीजों तक पहुंचना है।
अगर डॉक्टर बीमारी को जल्दी पहचान पाते हैं, उसकी गंभीरता को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं और उसके कारण के अनुसार उपचार तय कर पाते हैं, तो मरीज की देखभाल अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
मरीजों के लिए जरूरी बात
अगर आपको लगातार या पहले की तुलना में ज्यादा सांस फूल रही है, जल्दी थकान हो रही है, चक्कर आते हैं, सीने में दर्द होता है या पैरों में असामान्य सूजन दिखाई देती है, तो इसे केवल उम्र या सामान्य कमजोरी मानकर छोड़ना ठीक नहीं है।
इन लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर सांस फूलने वाला व्यक्ति पल्मोनरी हाइपरटेंशन से पीड़ित है।
लेकिन लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों की चिकित्सकीय जांच जरूर होनी चाहिए।
एक जरूरी स्पष्टीकरण
कार्यक्रम के दौरान पल्मोनरी हाइपरटेंशन के देर से पता चलने पर “हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट ही अंतिम उपचार” और “तीन साल में जीवित रहने की संभावना 55 प्रतिशत” जैसे दावे किये गये। इन्हें सभी मरीजों पर लागू होने वाले निश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है। पल्मोनरी हाइपरटेंशन कई प्रकार का होता है और मरीज पर इसका प्रभाव बीमारी के कारण, प्रकार, गंभीरता, उपचार और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों पर निर्भर करता है। इसी तरह ट्रांसप्लांटेशन केवल चुनिंदा, उन्नत मामलों में विचार किया जाने वाला उपचार विकल्प है।
डिस्क्लेमर :
यह ब्लॉग PH Summit 2026 की सामान्य कवरेज और सामान्य चिकित्सा जानकारी पर आधारित है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाना है, किसी व्यक्ति का निदान करना या व्यक्तिगत उपचार की सलाह देना नहीं। सांस फूलना, सीने में दर्द, चक्कर, बेहोशी या अन्य गंभीर लक्षण कई अलग-अलग बीमारियों के संकेत हो सकते हैं। अपनी स्थिति के अनुसार जांच और उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से सलाह लें। किसी दवा को डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू या बंद न करें।



