Fit In 50
Homeमानसिक स्वास्थ्यअल्जाइमर (Alzheimer's)की पहचान और इलाज में नई उम्मीद : Mini-Brains (Organoids)

अल्जाइमर (Alzheimer’s)की पहचान और इलाज में नई उम्मीद : Mini-Brains (Organoids)

Date:

Related stories

HIV/AIDS को लेकर दो महीने चलेगा यूपी में जागरूकता अभियान, युवाओं को दी जाएगी सही जानकारी

उत्तर प्रदेश में HIV/AIDS के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए दो महीने के सघन अभियान की शुरुआत की गई है। UPSACS की पहल के तहत युवाओं और आम लोगों को HIV संक्रमण, बचाव, जांच और उपचार की सही जानकारी दी जाएगी। अभियान में ‘अनुमान न लगाएं, स्कैन करें’ i-Scan पहल के जरिए HIV जोखिम के प्रति जागरूक करने और जांच व स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है।

आप नकली दवा तो नहीं खा रहे? लखनऊ में एफएसडीए की बड़ी कार्रवाई

नकली दवाओं के नेटवर्क पर कार्रवाई, चार के खिलाफ...

रीढ़ की हड्डी की टीबी से दब रहा था स्पाइनल कॉर्ड, सिविल अस्पताल लखनऊ में पहली बार हुई जटिल न्यूरोसर्जरी

लखनऊ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सिविल अस्पताल में न्यूरोसर्जरी सेवा शुरू होने के बाद पहली बार एक जटिल स्पाइन सर्जरी सफलतापूर्वक की गई। 37 वर्षीय मरीज की रीढ़ के L3 vertebra में टीबी संक्रमण के कारण न्यूरल संरचनाओं पर दबाव पड़ रहा था और पैर की ताकत कम हो रही थी। चिकित्सकों ने L2-L4 spinal fixation कर टाइटेनियम स्क्रू और रॉड लगाए। ऑपरेशन के बाद मरीज के पैरों में शुरुआती सुधार बताया गया है।

सांस फूलना हमेशा सामान्य नहीं : PH Summit 2026 में पल्मोनरी हाइपरटेंशन की जांच और इलाज पर विशेषज्ञों ने दिया जोर

लखनऊ में आयोजित PH Summit 2026 के दूसरे दिन पल्मोनरी हाइपरटेंशन की जांच और जोखिम के आकलन को लेकर विशेषज्ञों ने व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। इकोकार्डियोग्राफी, राइट हार्ट कैथीटेराइजेशन और कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग की हैंड्स-ऑन वर्कशॉप में डॉक्टरों ने आधुनिक जांच तकनीकों को समझा। विशेषज्ञों ने कहा कि सांस फूलने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करना और समय पर सही जांच कराना बेहद महत्वपूर्ण है।

सांस फूलने को सिर्फ कमजोरी न समझें, पल्मोनरी हाइपरटेंशन का हो सकता है संकेत

लगातार सांस फूलना, थकान, चक्कर या सीने में दर्द को हमेशा सामान्य कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये पल्मोनरी हाइपरटेंशन के संकेत भी हो सकते हैं। लखनऊ में आयोजित PH Summit 2026 में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने इस बीमारी की जल्द पहचान, आधुनिक जांच, जोखिम के आकलन और उपचार के नए विकल्पों पर चर्चा की।
spot_imgspot_img

अल्जाइमर (Alzheimer’s) रोग के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि हर मरीज एक जैसा जवाब नहीं देता। एक दवा किसी पर असर करती है, तो दूसरे पर नहीं। अब वैज्ञानिकों ने मरीजों की अपनी कोशिकाओं से प्रयोगशाला में “छोटे दिमाग” (Mini-Brains) यानी ब्रेन ऑर्गेनॉइड (Organoids) तैयार करके इस पहेली को सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।

हाल की रिसर्च में सामने आया है कि ये प्रयोगशाला में उगाए गए मिनी-ब्रेन न केवल अल्जाइमर के लक्षणों को दोहरा सकते हैं, बल्कि यह भी बता सकते हैं कि कोई विशेष दवा, जैसे अवसादरोधी, किसी मरीज पर कितना असर करेगी। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि अल्जाइमर के मरीजों से बने ऑर्गेनॉइड में सामान्य लोगों के ऑर्गेनॉइड की तुलना में दिमागी कोशिकाओं के संचार, सूजन और रोग से जुड़े मार्गों में बदलाव दिखाई दिए।

जब इन ऑर्गेनॉइड को आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली अवसादरोधी दवा एस्किटालोप्राम ऑक्सालेट दी गई, तो कुछ नमूनों में सेरोटोनिन सिग्नलिंग और कोशिकाओं के बीच संचार से जुड़े प्रोटीन बढ़े, जबकि कुछ में कोई बदलाव नहीं हुआ। इसका मतलब है कि भविष्य में डॉक्टर मरीज का इलाज शुरू करने से पहले ही प्रयोगशाला में जांच कर बता सकें कि कौन-सी दवा उसके लिए बेहतर काम करेगी। hopkinsmedicine.org

पृष्ठभूमि

अल्जाइमर दुनिया भर में डिमेंशिया का सबसे आम कारण है। यह धीरे-धीरे याददाश्त, सोचने और व्यवहार को प्रभावित करता है। अनुमान है कि इसकी जटिल प्रक्रिया को पूरी तरह समझने और असरदार दवा बनाने में अभी भी कमी है। पारंपरिक रूप से शोध के लिए जानवरों और दो आयामी कोशिका संवर्धन का उपयोग होता आया है, लेकिन उनमें मानव दिमाग की जटिल संरचना और रोग की नकल करने की सीमा है। pubmed.ncbi.nlm.nih.gov

अल्जाइमर के साथ एक और बड़ी समस्या न्यूरोसाइकिएट्रिक लक्षण है – जैसे अवसाद, चिड़चिड़ापन और नींद की गड़बड़ी। लगभग सभी अल्जाइमर मरीजों में ये लक्षण देखे जाते हैं और इनका संबंध दिमाग में सेरोटोनिन प्रणाली की खराबी से जोड़ा जाता है। एस्किटालोप्राम जैसी SSRIs यानी सेलेक्टिव सेरोटोनिन रीअपटेक इनहिबिटर दवाएं अक्सर इन्हीं लक्षणों के लिए दी जाती हैं। लेकिन हर मरीज को इनसे फायदा नहीं होता। कुछ में असर होता है, कुछ में नहीं। nature.comprogress.org.uk

इसी असमानता को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ वर्षों में स्टेम सेल तकनीक से बने 3D ब्रेन ऑर्गेनॉइड पर काम तेज किया है। ये ऑर्गेनॉइड मानव प्रेरित प्लूरिपोटेंट स्टेम सेल यानी iPSC से बनाए जाते हैं और दिमाग के शुरुआती विकास और रोग की प्रक्रियाओं की कुछ हद तक नकल कर सकते हैं।

अध्ययन का विवरण

यह शोध जॉन्स हॉपकिन्स मेडिसिन के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया और इसके निष्कर्ष हाल में प्रकाशित हुए। टीम ने स्वस्थ लोगों और अल्जाइमर के मरीजों के रक्त से iPSC लाइनें बनाईं और फिर उनसे हिंडब्रेन ऑर्गेनॉइड विकसित किए। हिंडब्रेन वह हिस्सा है जहां सेरोटोनिन बनाने वाले न्यूरॉन पाए जाते हैं। कुल 6 व्यक्तियों से iPSC लाइनें तैयार की गईं – 3 स्वस्थ स्वयंसेवक, 1 अल्जाइमर मरीज बिना न्यूरोसाइकिएट्रिक लक्षण के, और 2 अल्जाइमर मरीज न्यूरोसाइकिएट्रिक लक्षणों के साथ। nature.com

शोधकर्ताओं ने दो मुख्य चीजों की जांच की। पहली, अल्जाइमर के ऑर्गेनॉइड में प्रोटीन के स्तर में क्या बदलाव हैं। दूसरी, एस्किटालोप्राम देने के बाद ऑर्गेनॉइड कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। दवा देने से पहले और बाद में ऑर्गेनॉइड से निकलने वाले छोटे कणों – एक्स्ट्रासेल्युलर वेसिकल्स – में प्रोटीन की जांच की गई। ये वेसिकल्स दिमागी कार्यों जैसे न्यूरॉन के बीच संचार, याददाश्त और न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज से जुड़े प्रोटीन ले जाते हैं। hopkinsmedicine.org

इसके अलावा वैज्ञानिकों ने यह भी प्रस्ताव दिया कि भविष्य में इन ऑर्गेनॉइड में इम्यून कोशिकाएं और रक्त वाहिकाओं जैसी संरचनाएं जोड़ी जाएं ताकि मॉडल और ज्यादा सटीक हो सके। progress.org.uk

मुख्य निष्कर्ष

शोध में कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं।

पहला, अल्जाइमर के मरीजों से बने ऑर्गेनॉइड में स्वस्थ लोगों की तुलना में प्रोटीन के स्तर में स्पष्ट अंतर मिला। विशेष रूप से RAB3A, NSF और ATCAY जैसे प्रोटीन, जो सामान्य दिमागी कोशिका सिग्नलिंग के लिए जरूरी हैं, अल्जाइमर वाले ऑर्गेनॉइड में कम पाए गए। ये बदलाव दिमागी संचार, सूजन और रोग से जुड़े मार्गों से संबंधित थे। hopkinsmedicine.org

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष दवा की प्रतिक्रिया को लेकर था। जब ऑर्गेनॉइड को एस्किटालोप्राम ऑक्सालेट दिया गया, तो प्रतिक्रिया सभी में एक जैसी नहीं थी। कुछ मरीजों से बने ऑर्गेनॉइड में सेरोटोनिन सिग्नलिंग और सिनैप्टिक मार्गों से जुड़े प्रोटीन बढ़ गए, जो इस दवा के लक्ष्य हैं। लेकिन कुछ ऑर्गेनॉइड में बहुत कम या कोई बदलाव नहीं दिखा। वैज्ञानिकों ने कहा कि “हमने इन ऑर्गेनॉइड का उपयोग यह मॉडल करने के लिए किया कि कुछ मरीजों का ऊतक आम तौर पर निर्धारित SSRI पर कैसे प्रतिक्रिया दे सकता है”। medicalxpress.com

तीसरा, एक्स्ट्रासेल्युलर वेसिकल्स में भी दवा के बाद अलग-अलग आणविक बदलाव देखे गए। कुछ ऑर्गेनॉइड में प्रोटीन बढ़े, कुछ में नहीं। इसी भिन्नता के कारण शोधकर्ता मानते हैं कि भविष्य में इन वेसिकल्स का उपयोग यह पहचानने के लिए किया जा सकता है कि कौन से मरीज किसी विशेष इलाज से ज्यादा फायदा उठाएंगे। hopkinsmedicine.org medicalxpress.com

संक्षेप में, यह मॉडल बड़े पैमाने पर रोगियों के उप-समूहों की पहचान करने में मदद कर सकता है जो आणविक कारणों के आधार पर कुछ दवाओं पर बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं, और इस तरह सटीक, लक्षित उपचार बनाने में सहायक हो सकता है।

सीमाएं और सावधानियांकिसी भी नई तकनीक की तरह इस शोध की भी सीमाएं हैं जिन्हें समझना जरूरी है।ऑर्गेनॉइड अभी पूरी तरह से मानव दिमाग नहीं हैं। वे दिमाग के विकास और रोग की कुछ प्रक्रियाओं की नकल करते हैं, लेकिन उनमें पूरी तंत्रिका सर्किटरी या रोग की पूरी प्रगति नहीं दोहराई जाती। वर्तमान चुनौतियों में अपर्याप्त परिपक्वता, रक्त वाहिकाओं और इम्यून घटकों की कमी, और बैच-दर-बैच भिन्नता शामिल है।

इस विशेष अध्ययन का सैंपल आकार भी छोटा था – केवल 6 व्यक्तियों से iPSC लाइनें। इसलिए निष्कर्षों को बड़ी आबादी पर लागू करने से पहले और ज्यादा शोध की जरूरत है। इसके अलावा यह अभी शुरुआती चरण का मॉडल है। इसका मतलब यह नहीं है कि कल से ही डॉक्टर आपके खून से ऑर्गेनॉइड बनाकर दवा तय करेंगे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह “लंबे समय में” सटीक उपचार बनाने में मदद कर सकता है।

एक और बात – यह अध्ययन अवसादरोधी दवाओं की प्रतिक्रिया पर केंद्रित था, जो अल्जाइमर के न्यूरोसाइकिएट्रिक लक्षणों के लिए दी जाती हैं। यह अल्जाइमर की मूल बीमारी को ठीक करने वाली दवा नहीं है। इसलिए परिणामों को उसी संदर्भ में देखना चाहिए। progress.org.uk

भारतीय संदर्भ

भारत में 60 वर्ष से ऊपर की आबादी तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ डिमेंशिया के मामले भी बढ़ रहे हैं। ICMR और WHO के अनुमानों के अनुसार भारत में डिमेंशिया का बोझ महत्वपूर्ण है, लेकिन ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में निदान और उपचार में देरी आम है।इस शोध के भारतीय संदर्भ में तीन मायने हैं।

पहला, भारत में अल्जाइमर के साथ अवसाद और व्यवहार संबंधी समस्याएं बहुत आम हैं। अक्सर परिवार वाले इन्हें “बुढ़ापा” समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। अगर ऑर्गेनॉइड तकनीक से यह पता चल सके कि कौन से मरीज SSRIs से फायदा लेंगे, तो अनावश्यक दवा और उसके दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है।

दूसरा, भारत में क्लिनिकल ट्रायल और नई दवाओं की उपलब्धता सीमित है। ऑर्गेनॉइड जैसे मॉडल दवा खोज की प्रक्रिया को सस्ता और तेज बना सकते हैं। जानवरों पर परीक्षण एक रसायन के लिए औसतन 1.4 मिलियन डॉलर खर्चीला होता है, जबकि मिनी-ब्रेन से परीक्षण कुछ हजार डॉलर में हो सकता है। यह लागत प्रभावशीलता भारत जैसे देश के लिए महत्वपूर्ण है। sciencedaily.com

तीसरा, भारत में AIIMS, NIMHANS और अन्य संस्थान पहले से ही iPSC और स्टेम सेल रिसर्च कर रहे हैं। भविष्य में इस तकनीक को भारतीय मरीजों के जेनेटिक और पर्यावरणीय प्रोफाइल के साथ जोड़कर और ज्यादा प्रासंगिक बनाया जा सकता है। हालांकि अभी भारत में इस तकनीक का क्लिनिकल उपयोग उपलब्ध नहीं है और इसके लिए मानकीकरण, प्रजनन क्षमता और बड़े पैमाने पर उत्पादन की चुनौतियों को हल करना होगा। pubmed.ncbi.nlm.nih.gov

निष्कर्ष

ब्रेन ऑर्गेनॉइड की तकनीक अल्जाइमर अनुसंधान में एक नया अध्याय खोल रही है। यह हमें पहली बार यह मौका देती है कि हम मरीज के अपने ऊतक को प्रयोगशाला में देखकर यह समझें कि रोग कैसे काम करता है और दवा कैसे प्रतिक्रिया देगी। जॉन्स हॉपकिन्स के अध्ययन से पता चलता है कि एस्किटालोप्राम जैसी दवा के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग हो सकती है और इसे ऑर्गेनॉइड में पहले से मापा जा सकता है।

आगे का रास्ता स्पष्ट है। वैज्ञानिक अब ऑर्गेनॉइड में इम्यून कोशिकाएं और रक्त वाहिकाएं जोड़ने पर काम कर रहे हैं ताकि मॉडल और ज्यादा यथार्थवादी बने। AI और ऑटोमेशन के साथ मिलकर ऑर्गेनॉइड डेटा का विश्लेषण करने से कमजोर रोग संकेतों की पहचान और व्यक्तिगत उपचार की दिशा में मदद मिल सकती है। CRISPR से संपादित ऑर्गेनॉइड पारिवारिक अल्जाइमर के जेनेटिक मॉडल बनाने में भी उपयोगी हो सकते हैं। ukfrontiersin.org

पाठकों के लिए व्यावहारिक संदेश :

यह शोध आशाजनक है, लेकिन अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। अल्जाइमर का कोई “चमत्कारिक इलाज” अभी उपलब्ध नहीं है। अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग याददाश्त, व्यवहार या मनोदशा में बदलाव दिखा रहा है, तो उसे नजरअंदाज न करें। समय पर डॉक्टर से परामर्श और सही निदान ही अभी सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

अस्वीकरण :

यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यह किसी योग्य डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। अल्जाइमर या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या के लक्षण दिखने पर कृपया अपने डॉक्टर से संपर्क करें और व्यक्तिगत उपचार के लिए पेशेवर चिकित्सकीय सलाह लें।

Subscribe

- Never miss a story with notifications

- Gain full access to our premium content

- Browse free from up to 5 devices at once

Latest stories

spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here
Captcha verification failed!
CAPTCHA user score failed. Please contact us!

Share with