सिविल अस्पताल, लखनऊ की स्ट्रोक यूनिट में इलाज से लौटी आवाज और अंगों की शक्ति
Ischemic Stroke (स्ट्रोक)- लखनऊ।कल्पना कीजिए- ड्यूटी खत्म होने का समय है, दिनभर की थकान के बाद बस घर जाने की तैयारी बाकी है, और अचानक जमीन घूमने लगती है। आंखें खुलती हैं तो आवाज गले में अटक चुकी होती है, दाहिना हाथ-पैर जैसे साथ ही नहीं दे रहे। यही कुछ लखनऊ के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (सिविल) चिकित्सालय की एक 42 वर्षीय महिला कर्मी के साथ हुआ, लेकिन इस कहानी का अंत डर का नहीं, उम्मीद का है, क्योंकि यहां “समय” ने डॉक्टरों का साथ दिया, न कि बीमारी का।
ड्यूटी खत्म होने के वक्त आया झटका
सिविल अस्पताल में सफाई कार्य से जुड़ी इस 42 वर्षीय महिला को ड्यूटी समाप्त होने के समय अचानक बेहोशी छा गई। साथ काम करने वाले सहकर्मियों ने देर नहीं की। उन्हें तुरंत आईसीयू पहुंचाया गया। कुछ ही देर में होश तो लौटा, लेकिन एक नई मुश्किल सामने थी- वह बोल नहीं पा रही थीं, और उनके दाहिने हाथ-पैर में साफ कमजोरी थी। यहीं आईसीयू की सिस्टर इंचार्ज पुष्पा की सजगता काम आई। उन्होंने फौरन इन लक्षणों को स्ट्रोक के संकेत के तौर पर पहचाना और बिना समय गंवाए न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी से संपर्क किया। यही वह क्षण था जिसने आगे की पूरी कहानी की दिशा तय कर दी।
दो घंटे में लौटी आवाज और ताकत
टीम ने तुरंत मरीज का CT Brain कराया, ताकि यह पक्का किया जा सके कि दिमाग में कोई रक्तस्राव तो नहीं हुआ है, क्योंकि आगे का इलाज पूरी तरह इसी जांच के नतीजे पर निर्भर करता है। जब रिपोर्ट में रक्तस्राव नहीं पाया गया, तो चिकित्सकीय मानकों के अनुसार तुरंत rTPA thrombolysis शुरू कर दी गई, यह वह इलाज है जो दिमाग की बंद हो चुकी रक्त वाहिका को फिर से खोलने में मदद करता है। नतीजा चौंकाने वाला रहा। करीब दो घंटे के भीतर मरीज की आवाज वापस आने लगी, और उनके दाहिने हाथ-पैर की ताकत में साफ़ सुधार दिखने लगा। अस्पताल के मुताबिक इससे पहले भी एक मरीज को समय पर अस्पताल पहुंचने और इसी त्वरित स्ट्रोक-उपचार व्यवस्था का लाभ मिल चुका है, और वह मरीज आज पूरी तरह ठीक है।
आखिर rTPA और “गोल्डन पीरियड” है क्या?

न्यूरोसर्जन डॉ. विनोद कुमार तिवारी बताते हैं कि Acute Ischemic Stroke में उपयुक्त मरीजों के लिए लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर thrombolysis बेहद अहम भूमिका निभा सकती है। भारत सरकार की गाइडलाइंस के अनुसार भी यह “गोल्डन पीरियड” केवल साढ़े चार घंटे का ही है। इसके भीतर सही इलाज मिल जाए तो जान बचने के साथ-साथ स्थायी विकलांगता का खतरा भी काफी हद तक टल सकता है।
यही वजह है कि डॉक्टर बार-बार एक ही बात दोहराते हैं- चेहरा (Face)अचानक टेढ़ा होना, हाथ(Arm)-पैर में कमजोरी या बोलने (Speech) में दिक्कत जैसे लक्षण दिखते ही, समय गंवाए बिना तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए। यही तीन अक्षर- F, A, S – याद रखना जिंदगी और मौत के बीच का फासला तय कर सकता है।
किन्हें रहता है अधिक खतरा?
चिकित्सालय के निदेशक डॉ. जी.पी. गुप्ता के अनुसार कुछ स्थितियां स्ट्रोक के जोखिम को काफी बढ़ा देती हैं। इनमें हाइपरटेंशन यानी उच्च रक्तचाप, मधुमेह, 40 साल से अधिक उम्र, हाइपरकोलेस्ट्रॉलीमिया यानी कोलेस्ट्रॉल की अधिकता, और मोटापा प्रमुख हैं। हृदय के वाल्व संबंधी रोग यानी Valvular Heart Disease में भी थ्रोम्बोएम्बोलिज्म यानी रक्त के थक्के जमने का खतरा अधिक होता है। डॉ. गुप्ता कहते हैं कि जिन लोगों में इनमें से कोई भी जोखिम मौजूद है, उन्हें और उनके परिवार को स्ट्रोक के लक्षणों के प्रति खासतौर पर सतर्क रहना चाहिए। घर के हर सदस्य को यह पता होना चाहिए कि अचानक बोलने में दिक्कत, चेहरे का एक तरफ झुक जाना, हाथ-पैर में कमजोरी या बेहोशी दिखते ही मरीज को बिना देर किए नजदीकी स्ट्रोक यूनिट या उपयुक्त आपातकालीन सुविधा तक पहुंचाया जाए।
सिविल अस्पताल में अब चौबीसों घंटे तैयार व्यवस्था
इस पूरी सफलता के पीछे एक तैयार व्यवस्था भी काम कर रही है। सिविल अस्पताल में स्ट्रोक मरीजों के लिए आईसीयू में पांच बेड आरक्षित हैं, 24×7 CT स्कैन की सुविधा उपलब्ध है, और जरूरी thrombolytic दवाएं भी हर समय तैयार रहती हैं। अस्पताल के निदेशक डॉ. जी.पी. गुप्ता के निर्देश पर पात्र मरीज़ों को rTPA उपचार पूरी तरह निःशुल्क दिया जा रहा है- यानी समय पर पहुंचने वाले किसी भी मरीज़ के लिए पैसों की कमी इलाज में रुकावट नहीं बनेगी। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी.के. पाण्डेय और अधीक्षक डॉ. एस.आर. सिंह ने इस उपलब्धि पर डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, आईसीयू और रेडियोलॉजी टीम समेत पूरी टीम को बधाई दी है, और इसे सामूहिक तालमेल की मिसाल बताया है।
“Time is Brain” – एक चेतावनी, जो याद रखनी जरूरी है
डॉक्टर एक जुमला बार-बार दोहराते हैं — “Time is Brain”। इसका मतलब सीधा है- स्ट्रोक के दौरान दिमाग की कोशिकाएं हर गुजरते मिनट के साथ नष्ट होती जाती हैं। इसलिए जितनी देर होगी, नुकसान उतना ही बड़ा और कई बार स्थायी हो सकता है। सिविल अस्पताल की यह घटना इस बात की एक जिंदा मिसाल है कि अगर लक्षण पहचानने में देरी न हो और अस्पताल तक पहुंचने में समय बर्बाद न हो, तो गंभीर से गंभीर स्ट्रोक के बाद भी मरीज लगभग सामान्य जिंदगी की तरफ़ लौट सकता है। सवाल सिर्फ अस्पताल की तैयारी का नहीं है – हम सबकी सतर्कता भी उतनी ही अहम है।
निष्कर्ष : पहचान तुरंत तो राहत भी जल्द
इस मामले ने एक बार फिर साबित किया कि स्ट्रोक में समय से बड़ी कोई दवा नहीं होती। समय पर लक्षण पहचानना, समय पर अस्पताल पहुंचना और समय पर सही इलाज मिलना – इन तीनों की कड़ी अगर सही जुड़ जाए, तो जो बीमारी कभी स्थायी विकलांगता या जान का खतरा बन जाती थी, उसे भी काफी हद तक पलटा जा सकता है। सिविल अस्पताल जैसी सुविधाएं जब आम मरीजों तक मुफ्त और तेज पहुंच के साथ उपलब्ध होती हैं, तो यह पूरे समाज के लिए राहत की बात है। बस, याद रखने वाली बात एक ही है – चेहरा टेढ़ा हो, हाथ-पैर कमजोर पड़ें या आवाज अटके, तो इंतजार न करें, तुरंत अस्पताल पहुंचें।
चिकित्सा अस्वीकरण : यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है और यह चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। स्ट्रोक के लक्षण महसूस होने पर तुरंत नजदीकी अस्पताल या आपातकालीन सेवा से संपर्क करें और किसी योग्य चिकित्सक की सलाह लें।



